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سٽاءُ
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فني ڄاڻ
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ارپنا
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ليمو پاڻي
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پيش لفظ
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شاعري
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ڀاڱو پهريون
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توسان هڪ پل ملڻ جي خاطر، |
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بڻيا حاڪم ڏنگا هوندا،
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هو سوچ سمجهه ۾ سارو هو،
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لکيل جو آ تنهنجي مستڪ تي، |
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ڳالهائڻ جا سهڻا آهن، |
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زال
مڙس پڻ لڳن اڪيلا، |
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گدامڙي ڄڀ، پاڻي پاڻي، |
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اکه جئن اکه سان ٿي ٽڪرائي، |
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گرمي پگهر ۽ ڪپڙا تَرِ تَرِ، |
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جهُرڻَنِ جي ڦوهارَ ڏسو، |
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مَنُ مونکي ڀٽڪائي ڇو ٿو، |
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جهرڪين جا هي جهُنڊَ وَڻَنِ
ٿا، |
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دِلِ تنهنجي منهنجي هِڪَ آ، |
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آتنڪوادي سڀ دل وارا، |
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ايڏو وڏو رِڌُنِ جو ڌَڻُ، |
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تڪڙو تڪڙو هَليِ وَئي آ، |
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شاهوڪار جي سڀ ساري آ، |
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سهاڻا سهڻا ساوا ساوا، |
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دنيا ساري هَلُ هَلُ آهي، |
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شبنم شبنم، ڪِرِڻا ڪِرِڻا، |
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مورک روپ گهڻا بدلائي، |
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نه مان ياري ڦٽائينڊس، |
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جئه جئه جا ئي نعرا |
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گوليون باهيون، بم ڌڙاڪا، |
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سائين جو سمجهايل آهيان، |
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روز شام جو گڏجون ٿا، |
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ڏسو ڪيڏو نه هو سهڻو
لڳي ٿو، |
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جڳ ۾ رهندي ٿيو مونکي آڀاس آ، |
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وڻي آفتن جي ٿي هر ذات مونکي، |
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سانڍي جان ٿا بدليو رَنگَ، |
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رات سڄي آ سُکَه سان گُذري، |
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وديش ۾ جيڪي ڪمائڻ وَڃن ٿا، |
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لڳي موت جي ننڊ ۾ ڪو سُتلُ آ، |
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اسان کي ڪڏهن سَچُ چوڻ ڪو نه
آيو، |
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نه سواسن سان گڏجي، ڪا خوشبوُ
رهي ٿي، |
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چڱن جي سنگت مان ٿي پڙپي
چڱائي، |
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ڀاڱو ٻيو
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اُڀ
گجندو پو ڀلا ڇا ؟ |
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گوڙ
مچائي ڪڪر وَسَنِ ٿا، |
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وڪارن جو راوڻ، جلائي ته ڏس، |
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هوائن کي فضائن کي،
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قدم
سنڀالي جيڪي هلندا، |
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رُڳو جهُرِ جهُرِ لَڳائي ٿو، |
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خَطُ اهو تو مُڪو مُڪو، |
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بڻي
زندگي آ فسانو فسانو، |
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چيئه ٿي، ساهاڻي، حقيقت لڳي
ٿي، |
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ڏسي
شوخ نظرون ڊڄي ٿو وڃان مان، |
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جڏهن به دلبر ياد اچي ٿو، |
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جتان ٿئي ٿي اُلفت اُلفت، |
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آهه
ڀرسو ساه تي ڪهڙو، |
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وٽ
جلي ٿي، ميڻ رُئي ٿي، |
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مُرِڪ چين تي آيو مزو ٿي، |
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پئسي پويان ئي ڊُڪ ڊوڙ، |
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ڪجو معاف يارو مان لاچارُ
آهيان، |
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مون
ڳالهه چوڻ ٿي گهُري ڪِٿي،
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اڳيان نه تنهنجي ڪڇندو آهيان، |
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هوءَ ائن مرڪي ٿي ڳالهائي، |
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مونکي هوءَ ڏاڍي وڻي ٿي، |
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سڪ
سچي دل ۾ رکون جي، |
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اکه
ملائي گهُوري ڏوراپو ڏنائون، |
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لاوارث جي رُلنديون هونديون، |
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زالون روزيءَ لاءِ وڃن ٿيون، |
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ڏني
جي دل اٿم دِلبر، |
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جَڳَه
۾ منهنجو ڪوئي ناهي، |
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سڏ
به موٽي آيو آهي، |
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اُهي جي هٿ وَڌائن ٿا، |
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قدم
کي قدم سان مِلائي هلو، |
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ڇڏيندا اِهي گره ڌرتي ڏَڪائي، |
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مُرسڊ جن کي مليو نه آهي، |
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ڪَسُ کائن ۾ رَسُ آ دلبر، |
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منهنجي اُلفت، تنهنجي نِفَرت، |
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سچو
پيارُ پائي، جئَڻ تي به دِلِ
ٿي، |
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چِٽي پاڻ کي گهر مان ڏکجي ٿا
نڪرون، |
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ڀاڱو ٽيون
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پاڻ
کي دوست بي نقاب نه ڇَڏِ، |
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ڳوٺ
ڪنهن ڪنهن ۾ رهن ٿا اڙٻنگه،
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پيارُ ته تون ڀي، گهڻو ڪرين
ٿِي، |
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آهين تون سهڻي حوُر پَريِ، |
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جوڀن سونهن سُڳنڌ سُرهاڻِ، |
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ووٽ
ديش جا ماڻهو ڏيندا،
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قسم
به ڪوڙا کڻندو آهيان، |
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لڳائن ڄَڻُ بي زبان ٿو مان، |
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جواني ڀنڀلائي ٿي، |
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ماءُ جي ٿَڃُ جي پيتي آهي، |
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سنڌ، ڌرتيءَ لاءِ، سڪندو
آهيان، |
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ويو
سيارو، ويو سيارو، |
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ماٺِ بڻِي ٿِي ماٺِ نهاري، |
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پل
۾ پراوا، پنهنجا بڻجن، |
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مست
جواني آهه شَرارَتَ، |
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اَڄُ گهاٽا بادل ڏِسجَنِ ٿا، |
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زماني ۾ جڏهن ويچاربو ڪُجُهه |
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روز
ڌامڪو سرحد تي آ، |
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ڇو
نه ٿا ڪوڙ، سچ کي سمجهون، |
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رات
ڏينهن مان سفر ڪيان ٿو، |
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سونهن ڪنهن جي ڏسي نظر بڻجون، |
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ڪُس
ڪورٽ ۾ ڳالهه ٿوريءَ تان، |
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پرايون پچارون، چڱيون ڪين
آهن، |
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چڱو
ناهه يارو، رُڳو ڪجهه وٺڻَ ۾، |
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چکيم ديسي داروُن نشو ڪين
جهڙو، |
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اَسان سُرڳُ هِتِ هُتِ،
بَڻائڻ گُهرون ٿا، |
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ڪاڻي کي ڪاڻو پڻ ڪٿي ٿا چئون. |
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اَسان سُرڳُ هِتِ هُتِ،
بَڻائڻ گُهرون ٿا، |
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سِجَ جو ڪم رڳو سَفَر آهي، |
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ڳالهه تنهنجي مَڄي وڃان
شايَدِ، |
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وڪيلن کي هوُ، برغلائي سگهن
ٿا، |
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زالن سامهون جهُڪندا آهن، مڙد
مَڄوُ ٿي هلندا آهن. |
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چنبڙي ويٺا ائن گڏجي، |
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ڪوڙ
کي اَڄُ وڏو جِگرِ آهي، |
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ڀلا
ڪوئي لُچَ کي به ڇا ٿو چوي، |
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